*पैग़म्बरे इस्लाम* की शान में गुस्ताखी लगातार हिन्दुस्तान में बढ़ता जा रहा है ऐसा नहीं है के मुसलमान खामोश बैठा है हर गुस्ताखी के खिलाफ मुस्लिम संगठनों द्वारा एक्शन लिया जाता है लेकिन
सभी तंज़ीम या कमिटि या फिर संगठन या लोग साथ नहीं आते इसीलिए बड़ा एक्शन नहीं होता और फिर जिस इलाके से गुस्ताखी हुई बस वहाँ तक ही सीमित हो जाती है और जो लोग गुस्ताख़ के खिलाफ कार्यवाही की मांग करते हैं वो भी सिर्फ दिखावा तक ही रह जाते हैं अगर मुजरिम अंदर चला गया तो दोबारा वो तंज़ीम या लोग उस मुजरिम के बारे में जानकारी नहीं लेते क्या धारा लगा कितने दिन तक सज़ा पायेगा इस कोई मतलब नहीं होता बस अपनी वाह वाही तक ही पहल करते हैं उसके बाद कोई मतलब नहीं।
ज़रा गौर करें तो पता चलेगा की हम अपनी खुद इस्लाह तक नहीं कर सकते यहाँ तक की अपने घर में हो रहे गलतियों पर हम खुद पर्दा डाल देते हैं जबकि कुछ चीज़ें हमारे बस में हैं हम जब चाहें तब उस खराबी को जड़ से खत्म कर सकते हैं लेकिन नहीं करेंगे आज यही सुस्ती के कारण और हमारी खामोशी के कारण हमारे खुद के कमनियुटी में हज़ारों बुराइयां पैदा हो गई हैं और हम बड़े शौक़ से उन बुराइयों को आम करते हैं और करने वाले को मदद करते हैं आज क्या वजह है की बेटियां हमारी गैरों से संबंध बना रहीं हैं क्या आपका दिल नहीं दुखता क्या आपको थोड़ी भी फ़िक़्र नहीं होती मुझे लगता है नहीं होती और होगी भी क्यों क्यों की आपके घर का थोड़े ही मसला है जिसके घर का है वो समझे यही समझने के चक्कर में कल हमारी भी बारी आ सकती है कुछ तो करो मेरे प्यारे मेरे भोले मुसलमान थोड़ा ही सही जगाव अपने सोये ज़मीर को ये मत भूलो की तुम्हारी ज़रूरत नहीं है अगर नहीं होती तो आज हर आदमी सुख और चैन से रहता और किसी को किसी से कोई मतलब नहीं होता आज हमारे यहां जहेज़ का डिमांड इतना ज्यादा बढ़ता जा रहा है की एक गरीब परिवार समाज मे शर्मिंदगी महसूस कर रहा है इसे हमने इतना महंगा बना दिया की आज मिडिल क्लास फैमिली शरमा रहा है उसे अपनी हैसियत के बारे में फ़िक़्र होने लगती है करें तो क्या करें उन बच्चियों की आहें क्यों ले रहे हो जो इस्लाम एक पड़ोसी के हक की बात बताता हो ज़रा सोंचो की जिन बच्चियों के परिवार एक गरीब घराने से हो और तुम अपनी हैसियत दिखाने के चक्कर में मालो दौलत बे हिसाब लुटाते हो क्या उन्हें ये नहीं महसूस होता होगा की जो इस्लाम पड़ोसी की बात करे और इस्लामी बहनो की बात न करे ये हो नहीं सकता हमारा ईसलाम ज़रूर मदद की बात करता है लेकिन जहाँ ज़रूरत होती है वहाँ मदद नहीं होती ऐ लोगों अल्लाह अगर आपको दिया है तो ज़रूर खर्च करो लेकिन अपने समाज के उन लोगों को भी खयाल करो जिन्हे आप जानते हो आखिर इंसान अच्छा कर्म से ही जाना जाता है और अगर वाक़ई ज़र्रा बराबर भी इस्लाम से और अगर पैगम्बर ए इस्लाम से मोहब्बत है तो खुदा के लिए अपने हद तक ज़रूर मेहनत करो अपनो के लिए और समाज के लिए और इत्तेफाक व इत्तेहाद के साथ हमेशा सच का साथ दो अगर तुम नहीं कर सकते तो उनके साथ हो जाव जो अच्छा काम कर रहे हैं एकता में इतनी ताकत ज़रूर है की दुश्मन आप से ख़ौफ़ज़दा है और ये काम बग़ैर पैसे का हो सकता है जब भी कोई बेहतर और अच्छा काम हो तो तन मन से मिलकर करो इतना तो कर ही सकते हो । अल्लाह हम सबको अपने हबीब के सदके में हमे नेक और एक बनाए अमीन शुक्रिया
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