शादाब आलम रज़वी
हमारे मुस्लिम समाज में बच्चियों की शादी करना किसी एक घर का मसला नहीं बल्कि इस समय हम सभी लोगों के घर ज्यादातर यही सब परेशानीयां होती हैं।
हमारे खुद के सख्त रिवाजों ने हमारे मोहल्ले में ऐसा घर किया है कि वह या तो घर बसने ही नहीं देते या अक्सर बसे हुए घरों को उजाड़ देते हैं बाकी लानातो के साथ उनमें से एक सबसे बड़ी लानत दहेज की है इस दहेज की लानत ने कितने घर बसने से रोक रखे हैं गरीब घराने वाले लोग दो दो वक्त की रोटी मुश्किल से पूरी करते हैं भला वह अपनी जिंदगी की सबसे कीमती सय जब बेटी या बहन की सूरत में किसी के घर भेजते हैं तो क्या अभी भी किसी और चीज की जरूरत है मगर ये क्या यहां अभी रिश्ता तय नहीं हुआ कि लड़के वाले की जानिब से टीवी फ्रिज बेड सोफा सेट मोटरसाइकिल और भी चीजों के लिस्ट थमा दी जाती है और अगर लिस्ट ना भी मिले तो हमारे घर की बूढ़ी औरतों को आपस में कानाफूसी के जरिए यह बात पहुंचा दी जाती है कि अगर तुम्हारी बेटी है यह सामान दहेज में ना लाई तो अपने घर ही में बैठाए रखना वगैरा-वगैरा, दूसरी तरफ अगर कोई लड़की शादी में दहेज लेकर के जाती भी है तो हमेशा ताना दिया जाता है की फलां की बहू इतना सामान लाई और तू क्या लाई हमेशा घर में दूसरों से तुलना करना बड़ी बहू दहेज में बड़ा सामान लाई और तू सस्ता,छोटा। अगर आपकी बड़ी बहू किसी सेठ, और छोटी बहू किसी मजदूर की बेटी है तो इसमें कसूर आपका है बड़ी बहू जैसे आपको छोटी बहू भी अमीर घर से लाना था, सिर्फ बात यहां तक नहीं रुकती यह भी देखा गया है कि शादी के बाद भी लड़कों का डिमांड खत्म नहीं होता, मुझे अपने भाई से कर्ज दिलवा दो, नई गाड़ी खरीदनी है, और लोगों को तो जोर दिया जाता है कि मां-बाप से अपना हिस्सा ले यह अलग बात है कि हम अपनी बहन बेटियों को जायदाद में हिस्सा देते वक्त ₹100 का मौलवी साहब से ताबीज लेकर घर की दहलीज पर लटका देते हैं आखिर यह सब क्या है खुदारा सोचो कि जिसने अपना वजूद तुम्हें सौंप दिया अपनी मां की नरम गोद छोड़ दी बाप की मोहब्बत पीछे छोड़ कर अनजान घर तुम्हारे पास चली आई क्या अभी भी उससे मजीद मांग करने की कोई गुंजाइश बाकी है क्या इस तरह मुतालबा करना सही है। हजरत अबूहुरैराह (رضی اللہ تعالی عنہ) से मरवी है कि हुजूर (صلی اللہ تعالی علیہ وسلم) ने इरशाद फरमाया जो माल बढ़ाने का सवाल करता है वह अंगारे का सवाल करता है चाहे ज्यादा मांगे या कम । दहेज एक नासूर है इस लानत ने लाखों बहन बेटियों की जिंदगी को जहन्नम बना रखा है । इनकी आंखों में बसने वाले खूबसूरत ख्वाब छीन लिए हैं। उनकी खूबसूरत जिंदगी का गला घोट दिया है। उन्हें ना उम्मीदी मायूसी की गहरी वादियों में ढकेल दिया है जहां से उजाले का सफर नामुमकिन हो चुका है। ये रस्म वह है जिससे गरीब मां-बाप जिंदा दरगोर हो रहे हैं , और इस आस में जिंदा है की कोई इंसान इस लानत से पाक दो जोड़े कपड़ों में उनके जिगर को कुबूल करले लेकिन यह सब रस्म रिवाज समय के साथ और भी मजबूत होते जा रहे हैं इससे छुटकारा पाना नामुमकिन है।
मगर यह भी दुरुस्त है कि कुछ साल पहले जिन चीजों को कीमती शुमार किया जाता था वह आज मामूली जरूरत बन चुकी है लेकिन इसका मतलब हर गीज़ नहीं है कि लड़की के मां-बाप को कर्ज के समुंदर में दबा दिया जाए आज किसी के घर में लड़की पैदा होती है तो यह कहने सुनने में अच्छा लगता है कि ये (लड़की) अल्लाह की रहमत है पर यही रहमत बड़े होकर जहमत बन जाती हैं सिर्फ दहेज जैसी नासूर चीजों के वजह से । दहेज की असल हकीकत इसके सिवा कुछ नहीं कि लड़की के मां बाप जिन्होंने इसे पाल पोस कर बड़ा किया, घर की दहलीज से रुखसत होते वक्त अगर कुछ तोहफे देते हैं तो इसे दहेज नहीं बल्कि उनकी औलाद से मोहब्बत और ताल्लुक का ए्क सुबूत कहते है, लेकिन मौजूदा दौर मैं इन सब चीजों ने हालातों को इंतेहाई खौफनाक बना दिया है,
जो पहले कभी ना थे । मां बाप के उन तोहफों को लड़के वालों ने फ़रमाइश प्रोग्राम बना दिया है और पुराना होने पर जुल्म व ज्यादती की जाती है जो कि सरासर नाइंसाफी है, यही वजह है कि पहले यह समाजी रस्म हुवा करते थे आज जहेज़ बन गया है, इसे लानत की वज़ह से जो ज़ुल्म व सितम बहु बेटियां पर किया जाता है उसे बयान नही किया जा सकता, ओल्माये किराम व मुफ़्तियाने आज़ाम को चाहिए कि जैसे रात गयी शादी बियाह व शोरगुल पर पाबंदी आइद की है वैसे ही सख्त फैसले लिए जाए जिससे दहेज़ लेने देने को जुर्म क़रार दिया जाए और जो इस जुर्म का इरतेकाब करेगा उससे शरई गिरूफ्त और भारी जुर्माने की जाए ताकि कोई ऐसा आइंदा न करे। अमीरो का कुछ नही लेकिन ग़रीबो की बेटियाें पर ये मुसीबत साबित हो रही है और हज़ारो लड़कियां इसके भेंट चढ़ जाती है। खुदकुशी करने पर मजबूर हो रही है, दहेज़ का लेनदेन ग़ैर इस्लामी है। इस घिनावनी गैर इस्लामी रश्म को ख़त्म करने में नौजवान अहम रोल अदा कर सकते है, यह इस सूरत में मुमकिन है जब आज के नस्ल जहेज़ का लालच अपने दिल से निकल दे और समाज में इस अमल से इंक़लाब बरपा करें। मैं ऐसे लोगों को भी जनता हुं जिनकी बेटियाँ सिर्फ जहेज़ न होने की वजह से घर मे बैठी है, साथ ही साथ ज़ात-पात , क़ाबिले की बहस में पड़ कर बेटियाें को घर पर बिठाये रखां है और किसी दूसरे घर से बेटी न लाने की रस्म ज़हर की तरह फ़ैलते जा रही है। जहेज़ की रस्म नासूर की तरह मुआशरे में फैल चुकी है जिस के वजह से दीगर बुराइयां, खुदकुशी,चोरी ,तलाक और भी कई समाजी मसाइल जन्म ले रही है, ऊपर से शादी में रश्मात की पैवन्दकारी ने भी इस को महंगा तरीन बना दिया है , अमीर घराने में तरह तरह की रसुमात की देखा देखी हम मिडिल क्लास के लोग समाज को किस तरफ ले जा रहे हैं उसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है।
हराम कामों से शुरू हुई जिंदगी में बरकते होंगी या फितने।
काश कि हमारी समाज में मौजूदा इन चंद बुनियादी लानतें खत्म हो जाए और हमारा जहन अनगिनत चिंताओं से पाक हो जाए और गरीब मां-बाप जंजीरो से आज़ाद होकर अपने फर्ज को अदा कर सकें। आओ मिलजुल कर इसे खत्म करें । हमें मिसाल कायम करनी पड़ेगी तभी धीरे-धीरे सब चीजों पर काबू पाया जा सकेगा। वालदैन से हमारी कुछ नसीहतें है-
जो लोग दहेज में पैसे मांगते हैं उन्हें भीख दें अपनी प्यारी बेटी नहीं मैंने वालदेन को दहेज में वह सब चीजों को भी देते देखा है जो उनके अपने घर में मौजूद नहीं। जब बेटियाें को रुखसत किया करें तो उन्हें बता दिया करें कि हमने इंसान का बच्चा देखकर रिश्ता किया है अल्लाह ना करे अगर वो जानवर का बच्चा निकल आया तो घर वापसी का दरवाजा हमेशा खुला है क्योंकि दोबारा शादी हो सकती है, जिंदगी एक बार ही मिलती है । इस नफसीयती मरीज के लिए जान गवा ना जहालत है। बेटियों को सही मानो में तहफ्फुज और मोहब्बतें दें उन्हें समझाएं कि खुदकुशी किसी भी परेशानी का हल नहीं।
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